जनजातीय किसानों के 15 हेक्‍टेयर खेत में लहलहाएगी तिल की फसल

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दैनिक झारखंड न्‍यूज

रांची । खूंटी जिले के जनजातीय किसानों के 15 हेक्‍टेयर जमीन पर तिल की फसल लहलहाएगी। अखिल भारतीय समन्वित परियोजना तिल और रामतिल के तहत राज्य में तिल की खेती को बढ़ावा देने का कार्यक्रम शुरू किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के सौजन्य से बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के अधीन यह संचालित है।

परियोजना के तहत शुक्रवार को खूंटी के तोरपा प्रखंड के जनजातीय किसानों के बीच तिल के सत्यापित बीज का वितरण किया गया। इस अवसर पर प्रखंड के रेडुम, डोरमा, कोनकारी एवं चुरगी गांव के 20 जनजातीय किसानों को 2 किलो बीज दिया गया। इससे किसानों के 15 हेक्टेयर भूमि में अग्र पंक्ति प्रत्यक्षण कराया जायेगा। किसानों को रोग एवं कीट की दवा देने के साथ-साथ तकनीकी मार्गदर्शन भी बीएयू वैज्ञानिक करेंगे।

परियोजना अन्वेषक डॉ सोहन राम ने किसानों को तिल की वैज्ञानिक तकनीक से खेती की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तिल को विश्व का सबसे प्राचीन तिलहन फसल कहा जाता है। देश में इसकी खेती 5 हजार साल पहले शुरू हुई थी। परंपरागत खेती से राज्य के किसानों को सही लाभ नहीं मिल पाता है। इस फसल की उपज कम लागत और कम पानी में 80 दिनों की अवधि में ली जा सकती है। चालू खरीफ मौसम की विषम स्थिति को देखते हुए तिल सबसे उपयुक्त वैकल्पिक फसल है। उन्नत प्रभेद एवं वैज्ञानिक तकनीक से तिल की खेती से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। बीज वितरण में देवेन्द्र कुमार सिंह ने सहयोग दिया।

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