JPSC की धांधली : गायब हो गये दिव्यांगजनों के पद

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सुनील कमल

हजारीबाग । झारखंड लोक सेवा आयोग ने राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया 2018 में शुरू की थी। इसके लिए विज्ञापन (संख्या : 05/2018) निकाला गया। ये नियुक्ति बैकलॉग के तहत ली जा रही है। इसमें वर्ष 2008 की नियुक्ति और उससे पहले से खाली पदों को भरा जाना है। विडंबना है कि व्‍याख्‍याता की नियुक्ति अब तक सिर्फ एक बार (विज्ञापन संख्या : 01/2007) के तहत वर्ष 2008 में ही झारखंड के विश्वविद्यालयों में हुई है। सिर्फ एक बार के बाद ही बैकलॉग नियुक्ति होना सवाल खड़ा करता है। अगर नियुक्ति हो भी रही है, तो इसमें दिव्यांगजनों के पद होने चाहिए।

वर्ष 2008 की नियुक्ति में 777 की संख्या में नियुक्ति की अनुशंसा तो हुई, परंतु दिव्यांगजनों को तीन प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया गया। सिदो-कान्‍हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में एक भी दिव्यांग की नियुक्ति नहीं हुई। आयोग ने बैकलॉग नियुक्ति में दिव्यांगजनों के बच गये पदों को विज्ञापन (संख्या : 05/2018) में क्यों नहीं शामिल किया? झारखंड उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बीरेन्द्र सिंह ने जनहित याचिका (संख्या : 7525/2013) में आयोग को प्रत्येक नियुक्ति में दिव्यांगजनों के बैकलॉग पद चिन्हित कर भरने का निर्देश दिया गया है। आयोग ने इसे नहीं माना। पांच विषयों के प्रकाशित परीक्षाफल में आयोग ने दिव्यांगजन के पद कहीं पर नहीं दिखाए हैं और ना ही कोई जिक्र किया गया है।

आयोग ने राज्य निःशक्तता आयुक्त सतीश चंद्र की भी बात नहीं मानी है। आयुक्‍त ने झारखंड सरकार के कार्मिक विभाग के संकल्पों के तहत दिव्यांगजनों को नियुक्ति में बराबर यानी अंध दिव्यांग, चलंत दिव्यांग, मूक बधिर एवं अन्य दिव्यांगजनों को आरक्षण देने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने किसी के निर्देश को अब तक नहीं माना है।

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