JPSC की धांधली : दिव्यांगजनों के पदों पर टिकी थी आयोग की नजरें

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सुनील कमल

हजारीबाग । झारखंड लोक सेवा आयोग की नजरें दिव्यांगजनों की खाली सीटों पर टिकी हुई थीं। झारखंड उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वीरेन्द्र सिंह ने लोक जनहित याचिका (WP-PIL संख्या : 7525/2013) की सुनवाई के दौरान आयोग को निर्देश दिया था कि अब तक जितने भी दिव्यांगजनों के रिक्‍त पद हैं, उसे अगली नियुक्ति में भर लिया जाये। ध्यान रहे कि कोई भी पद नहीं छूटे। तब से आयोग की नजरें दिव्यांगजनों की सीट पर अटक गयी थी। क्योंकि दिव्यांगजनों की खाली सीट 16 हो गयी थी।

आयोग ने छठी सिविल सेवा के एग्जाम (विज्ञापन संख्या : 23/2016) में वही किया, जिसका डर दिव्यांगजनों को पहले से था। इस परीक्षा में आयोग ने दिव्यांगजनों को उनका हक नहीं दिया। अंतिम परीक्षाफल में आयोग ने अंध दिव्यांग और चलंत दिव्यांग के दो-दो पद शारीरिक सशक्त अभ्यर्थियों को दे दिये। ऐसा कर आयोग ने झारखंड सरकार के कार्मिक विभाग के संकल्प (संख्‍या : 7281/2007 और संकल्प : 2249/03.04.2018) की धज्जियां उड़ा दीं। इन अधिनियमों में कहा गया है कि दिव्यांगजनो के खाली पदों को दिव्यांगजनों के बीच हीं अदला बदली कर भरना है। हालांकि आयोग इस नियम को ताखे पर रखकर अंतिम परीक्षा फल प्रकाशित किया है।

आयोग से एक अंध दिव्यांग रविशंकर मंडल के आरटीआई के तहत सूचना मांगी गई सूचना का जवाब तक नहीं दिया। नियम कानून का हवाला देते हुए कह दिया कि सूचना उपलब्‍ध कराना संभव नहीं है। उन्‍होंने कई सवाल पूछने के साथ चयनित दिव्यांगजनों के विवरण की मांग की थी। अब दिव्यांगजनों ने आयोग के दिव्यांगजनों के पूरे रिजल्ट की सीबीआई जांच की मांग सरकार के समक्ष करने की बात कही है। उनका आरोप है कि चयनित दिव्यांगजन ज्यादातर फर्जी हैं। सभी चयनित दिव्यांगजनों की दिव्यांगता की जांच उच्चस्तरीय मेडिकल टीम द्वारा कराई जाये। दोषियों को अविलंब जेल भेज जाये। अन्यथा असली दिव्यांग ऐसे ही बार-बार आयोग द्वारा फेल कर दिए जाएंगे। फिर दिव्यांग पूरी उम्र कोर्ट की परिक्रमा करते रहेंगे।

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