कम अवधि में पकने वाली किस्मों का विकास समय की मांग : डॉ शर्मा

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  • बीएयू वैज्ञानिकों ने मुल्लार्प फसलों के राष्ट्रीय वार्षिक रबी समूह की बैठक में भाग लिया

दैनिक झारखंड न्‍यूज

रांची । आईसीएआर के उपमहानिदेशक (फसल सुधार) डॉ टीआर शर्मा ने बदलते मौसम और बाजार की डिमांड को पूरा करने के लिए मुल्लार्प शोध से जुड़े वैज्ञानिकों को सूखा सहिष्णु एवं रोगरोधी दलहन किस्मों के विकास पर बल दिया। परती धान खेत के लिए अनुकूल किस्मों को प्राथमिकता देने की बात कही।

उन्होंने कहा कि आज कम अवधि में पकने वाली किस्मों का विकास समय की मांग हैं। वैज्ञानिकों को बडी संख्‍या में विभिन्न स्‍थानों पर अति अगेती फसल परीक्षण के लिए विशेष शोध किए जाने चाहिए। वे आईसीएआर-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्‍थान, कानपुर के तत्वावधान में वेबिनार के माध्यम से मुल्लार्प (मूंग, उरद, मसूर, खेसारी, राजमा व मटर) फसलों का एक दिवसीय राष्ट्रीय वार्षिक रबी समूह की बैठक को संबोधित कर रहे थे।

मुल्‍लार्प के राष्ट्रीय परियोजना समन्वयक डॉ संजीव गुप्ता ने इसके अधीन रबी फसल मसूर, खेसारी और मटर की शोध गतिविधियों, उपलब्धि एवं आगामी रणनीति से सबंधित विस्तृत प्रतिवेदन को पेश किया। वेबिनार में 18 राज्यों में संचालित अखिल भारतीय समन्वित मुल्लार्प अनुसंधान  परियोजना के 25 केंद्रों के 90 वैज्ञानिक ने भाग लिया।

रांची केंद्र के परियोजना अन्वेंषक डॉ सीएस महतो ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में इन फसलों पर हो रहे प्रयोगों के नतीजों पर चर्चा की। झारखंड में मटर एवं मसूर की खेती में विगत वषों में उल्लेखनीय प्रगति की बात कही। इसमें फसलों की नई किस्मों मालवीय मटर-15, दांतीवाड़ा मटर-1,  डब्‍ल्‍यूबीएल-77 और केएलएस-218 का प्रमुख योगदान है। रबी में 65  हेक्टेयर में मटर और 58  हेक्टेयर में मसूर की खेती की गई, जिसकी औसत उपज क्रमश: 1217 एवं 880 किलो प्रति हेक्टेयर रही।

डॉ पीके सिंह ने दलहनी फसलों में पौधा सुरक्षा के नतीजों को प्रस्तुत किया। डॉ एस कर्मकार ने झारखंड में राइस फॉलो भूमि में इन फसलों का अधिक से अधिक विस्तार की आवश्यकता जतायी।

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