JPSC की धांधली : राज्य निःशक्तता आयुक्‍त की बात नहीं मानी है आयोग ने

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सुनील कमल

हजारीबाग । झारखंड लोक सेवा आयोग लगातार नियमों का उल्‍लंघन करता रहा। कई बार इसका पालन का निर्देश भी आयोग को मिला। इसके बाद भी आयोग ने उसे दरकिनार कर दिया। इसी क्रम में आयोग ने राज्‍य नि:शक्‍तता आयुक्‍त की बातों को नहीं माना।

आयोग ने (विज्ञापन संख्या : 23/2016) के आलोक में छठी सिविल सेवा ने नियुक्ति के लिए 326 पदों की अनुशंसा सरकार को भेज दी। कार्मिक विभाग ने भी इनकी अनुशंसा मान ली। उत्‍तीर्ण करार दिये गये अभ्‍यर्थियों के दस्‍तावेजों का सत्‍यापन संबंधित विभाग द्वारा किया जा रहा है। एक-एक कर सभी विभाग अभ्‍यर्थियों को बुला रहे हैं।

अनुशंसा मानने से पहले कार्मिक विभाग ने आयोग की गलतियां नहीं देखी। आयोग ने दृष्टिबाधित दो दिव्यांगों के पद आंख वालों को दे दिए। दिव्यांगजनों ने इसकी शिकायत राज्य निःशक्तता आयुक्त सतीश चंद्र से की। आयुक्त ने आयोग को दिव्यांग अधिनियम का हवाला देते हुए दिव्यांगजनों को उनका हक और अधिकार देने का निर्देश दिया। आयोग ने आयुक्‍त और कार्मिक विभाग के आदेश की अनदेखी कर दी।

दिव्‍यांग अभ्‍यर्थियों का कहना है कि स्वयं झारखंड सरकार के कार्मिक विभाग ने 1995 और 2016 में दिव्यांगता अधिनियम बनाये है। इसमें साफ लिखा है कि दिव्यांगजनों के पद दिव्यांगों को ही मिलेंगे। अगर अंध दिव्यांग नहीं है तो मूक बधिर, अस्थि या अन्य योग्य दिव्यांग को पद दिये जाएंगे। परंतु ना तो आयोग और ना ही कार्मिक इस बात को स्वीकार कर रहा है। आयोग की हर अनुशंसा को कार्मिक भी मान ले रहा है। ऐसे में अपने हक और न्याय के लिए दिव्यांगजन जायें कहां ? न्यायालय में तो पहले वर्ष 2013 से इनके मामले चल रहे हैं।

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