JPSC की धांधली : व्‍याख्‍याता नियुक्ति में गढ़े कई कीर्तिमान

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सुनील कमल

हजारीबाग । झारखंड लोक सेवा आयोग के सदस्‍यों ने अपनों को व्‍याख्‍याता बनाने के लिए नियुक्ति में कई कीर्तिमान गढ़े। एक उम्‍मीदवार पहले व्‍याख्‍याता बना गया। बाद में उसके स्‍नातकोत्‍तर का परीक्षाफल जारी हुआ। एक एजेंसी की जांच के क्रम में सदस्‍य ने इस सच्‍चाई को भी छुपा लिया।

झारखंड लोक सेवा आयोग ने (विज्ञापन संख्या : 01/2007) के तहत राज्य के तीन विश्वविद्यालय में व्‍याख्‍याता की नियुक्ति वर्ष 2008 में की। इसका परीक्षाफल 14 जनवरी, 2008 को प्रकाशित किया गया। परीक्षाफल में कई आश्चर्यजनक बातें देखने को मिली। आयोग के एक तत्कालीन सदस्य ने अपने पुत्र को पहले व्‍याख्‍याता बना दिया। उसके स्नातकोत्तर (एम कॉम) का परीक्षाफल बाद में निकला। निगरानी जांच में तत्कालीन सदस्य ने गलत जानकारी दी।

यूजीसी एक्ट और सेंट्रल एक्ट के तहत व्‍याख्‍याता नियुक्ति के लिए पहले स्नातकोत्तर की परीक्षा 55% अंकों से उतीर्ण होना अनिवार्य है। वह भी आवेदन देने वक़्त ही होना चाहिए। इसके बाद अभ्यर्थी के पास बेट, नेट, स्लेट और पीएचडी में से किसी एक उपाधि होना जरूरी है। हालांकि अपनों को व्‍याख्‍याता बनाने की ललक में आयोग ने यूजीसी और सेंटल एक्ट की धज्जियां हीं उड़ा दी। पूरे परीक्षाफल में अपनों को लेने की होड़ लगी रही। सारे नियम कागजों में हीं सिमट कर रह गये। प्रतिभाशाली अभ्यर्थी फेल हो गये। पूरे घोटाले की सीबीआइ जांच की रिपोर्ट कोर्ट और सरकार को मिल चुकी है। अब फैसले का इंतजार है।

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