ढह गया वो विशाल रेडियो टेलिस्कोप Arecibo, जिसने 50 वर्ष धरती को उल्कापिंडों से बचाया

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दैनिक झारखंड न्यूज

नई दिल्ली । बीते 50 सालों से धरती को खतरनाक उल्कापिंडों से बचाकर रखने वाला विशाल रेडियो टेलिस्कोप ढह गया है। इस कारण कई खगोल वैज्ञानकों की आंखों से तो आंसू तक निकल आए। दुनिया की अहम ऑब्जर्वेटरीज में से एक Arecibo मंगलवार को पूरी तरह से ढह गया। अमेरिका के कैरेबियन आइलैंड प्योर्टो रीको में लगा यह विशाल रेडियो टेलिस्कोप लंबे समय से जर्जर हालात में था। इस विशाल टेलिस्कोप के ढहने पर मीटियरॉलजिस्ट अदा मोनजन की आंखों से तो आंसू निकल आए। अदा ने कहा कि Arecibo को बचाने की सारी कोशिशें की गई थी लेकिन 900 टन का प्लैटफॉर्म 400 फीट नीचे रिफ्लेक्टर डिश पर जा गिरा।

Arecibo की खूबियां

गौरतलब है कि US नेशनल साइंस फाउंडेशन ने पहले ही बता दिया था कि जल्द ही Arecibo को बंद कर दिया जाएगा। फाउंडेशन ने बताया है कि इस हादसे में कोई घायल नहीं हुआ है। Arecibo का ऑग्जिलरी केबल अगस्त में क्षतिग्रस्त हो गया था, 1000 फुट चौड़ी रिफ्लेक्टर डिश पर 100 फुट से ज्यादा का कट लग गया था। इसकी वजह से ऊपर लटक रहा प्लैटफॉर्म क्षतिग्रस्त हो गया था। वैज्ञानिक इसे दुनिया का सबसे बड़ा रेडियो टेलिस्कोप मानते थे और इस घटना से विज्ञान जगत सदमे में है। यूनिवर्सिटी ऑफ प्योर्टो रीको में ऐस्ट्रोनॉमर और प्रफेसर कार्मेन पंटोजा ने विज्ञान के लिए सबसे बड़ा नुकसान बताया है।

वैज्ञानिकों ने इस घटना को बताया तूफान

Arecibo में दशकों तक कई वैज्ञानिक काम कर चुके हैं। इसके जगब काम कर चुके एक वैज्ञानिक डॉ. जोनाथन फ्रीडमेन ने घटना को ‘तूफान’ जैसा बताया। पहले तो ऐसा लगा जैसे भूकंप आया हो। बारिश या बर्फ के तूफान जैसा लगा। वहीं मीटियरॉलजिस्ट डेबोरा मारटोरेल ने घटना पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इसे हादसे को टाला जा सकता था। नौकरशाही ने बैठकर तमाशा देखा और हादसे का इंतजार किया कि NSF प्लैटफॉर्म को ढहाए। उन्होंने कहा कि Arecibo विज्ञान जग का रत्न थी।

इसलिए कहते थे धरती की आंख

धरती की ओर अंतरिक्ष से आने वाले खतरों से आगाह करने वाला एक हथियार कम हो गया है। Arecibo को धरती की आंख भी कहा जाता था। ऐसा विशाल और ताकतवर रेडियो टेलिस्कोप था, जिससे वैज्ञानिक विशाल स्पेस रॉक्स को देखते थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब इतनी आसानी से Arecibo की जगह कोई नहीं ले पाएगा। इसका रेडार ट्रांसमीटर किसी ऑब्जेक्ट की ओर लाइट भेजता था, जो टकराकर वापस लौटती थी तो इसकी रेडियो डिश इस सिग्नल को पकड़ती थी। इससे वैज्ञानिकों को उल्कापिंडों की स्थिति, आकार और सतह के बारे में जानकारियां मिलती थी।

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