गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है मां के विचारों का प्रभाव: कैंब्रिज यूनिवर्सिटी

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दैनिक झारखंड न्यूज

नई दिल्ली गर्भस्थ शिशु पर मां के आचार-विचार का प्रभाव पड़ने की मान्यता भारतीय दर्शन में युगों पुरानी है। शास्त्रों में गर्भसंस्कार का उल्लेख है। इसके महत्व को अब विदेशों में भी स्वीकार किया जा रहा है। कुछ समय पहले कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने गर्भसंस्कार पर शोध किया गया। शोध में माना गया कि गर्भस्थ शिशु पर मां के व्यवहार, भावनाओं और सामाजिक वातावरण का प्रभाव पड़ता है।

देश-विदेश में तीन हजार 256 कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया

हरिद्वार के शांतिकुंज से संचालित गर्भसंस्कार को देश-विदेशों में अपनाया जा रहा है। कोरोना संकट में ऑनलाइन यह संस्कार किया गया। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के डॉ. रूपर्ट शैल्ड्रेक के सिद्धांत फार्मेटिव काजेशन के अनुसार गर्भ के समय मां के विचार, भावनाओं, आहार, पारिवारिक तथा सामाजिक वातावरण द्वारा एक परभौतिक मार्फोजेनिटक बल क्रियाशील होता है जो गर्भस्थ शिशु के व्यक्तित्व, चरित्र, भावनाओं, चिंतन एवं क्रियाकौशल के लिए जिम्मेदार होता है।

मालूम हो, गर्भसंस्कार के आयोजनों से देश के उप्र, मप्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान, एनसीआर, उत्तराखंड, ओडिशा, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, व दक्षिण भारत के राज्य जुड़े हैं तो अमेरिका, इंग्लैंड, रशिया, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल में प्रशिक्षण शिविर लगाए गए। देश-विदेश में तीन हजार 256 कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया है। एक कार्यकर्ता के साथ करीब 40 गर्भवती महिलाएं गर्भसंस्कार में शामिल होती हैं। अब तक लाखों गर्भसंस्कार करवाए गए हैं।

ऐसे होता है गर्भसंस्कार

गर्भस्थ शिशु के दिमाग का विकास तीन से सात माह के बीच तेजी से होता है। दिमाग में ढाई से पांच लाख सेल्स हर मिनट बनते हैं। जिन्हें न्यूरांस कहते हैं। मां की क्रियाशीलता से यह न्यूरांस सक्रिय होते हैं। वैज्ञानिक शोध के अनुसार गर्भावस्था के दौरान यदि मां बौद्धिक गतिविधि करती है, संगीत सुनती है, महापुरुषों की जीवनी पढ़ती है या सुनती है तो इसका सकारात्मक असर न्यूरान पर पड़ता है। इससे अच्छे हार्मोंस का स्त्राव ज्यादा होता है।

गर्भस्थ शिशु संवाद भी करता है। बीज मंत्र, बांसुरी, वाद्ययंत्रों के नाद को वह जल्दी ग्रहण करता है। इससे दिमाग ज्यादा सक्रिय होता है। संस्कृत के श्लोक से दायां और बायां दिमाग संतुलित होता है। यह सभी क्रियाएं गर्भसंस्कार के दौरान सिखाई जाती हैं। यह प्रक्रिया गर्भधारण के तीन माह से शुरू होकर प्रसव तक चलती है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

गर्भस्थ शिशु के दिमाग के न्यूरांस को सक्रिय करने के लिए शिशु के साथ सकारात्मक संवाद किया जाता है। गर्भसंस्कार से हम गर्भस्थ शिशु के एपिजीन पर असर डालते हैं। इसके लिए प्रेरक कहानियां और हर धर्म की चर्चा की जाती है। वर्तमान में गर्भवती को ऑनलाइन योग, प्राणायाम कराया जा रहा है। – डॉ. गायत्री शर्मा, प्रभारी, आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी व पूर्व डायरेक्टर जनरल, मेडिकल हेल्थ उत्तर प्रदेश

गर्भसंस्कार में हिंदू, मुस्लिम व क्रिश्चियन समुदाय की गर्भवतियां शामिल हुई हैं। कोरोनाकाल में ऑनलाइन गर्भसंस्कार करा रहे हैं। अमेरिका, फ्लोरिडा से भी गर्भवतियां ऑनलाइन इसे सीख रही हैं। – डॉ. रेखा प्रकाश, को-आर्डिनेटर, आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी, गुरुग्राम

गर्भस्थ शिशु पर मां के व्यवहार के प्रभाव पर कैंब्रिज में शोध हुआ है। हमारी परंपरा को विदेश में भी वैज्ञानिक माना गया है। गर्भसंस्कार का मुख्य उद्देश्य शिशु के दिमाग के न्यूरांस को सक्रिय करना है। इसका हम सीटी स्केन से परीक्षण भी करते हैं। – डॉ. अमिता सक्सेना, नोडल अधिकारी, मध्य प्रदेश

क्रिश्चियन समुदाय भी गर्भसंस्कार से जुड़ा है। गर्भवतियों को बाइबिल से कहानी सुनाती हूं। इससे सकारात्मक संदेश गर्भस्थ शिशु के दिमाग तक पहुंचता है। इसके बेहतर परिणाम साबित हो चुके हैं। – डॉ. रेखा जेम्स, स्पीकर, आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी व वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ, जबलपुर

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