जानिए, कितनी सुरक्षित होगी कोरोना वायरस की वैक्सीन और क्‍या हैं इसके तय मानक

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दैनिक झारखंड न्यूज

नई दिल्ली । ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोविशील्ड के परीक्षण में शामिल चेन्नई निवासी एक स्वयंसेवक ने गत दिनों उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठा दिया।हालांकि, कोविशील्ड के विकास में शामिल सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है और जब तक उसके प्रभावों का सटीक आकलन नहीं होगा, उसे बाजार में नहीं उतारा जाएगा। इस समय कम से कम पांच वैक्सीन परीक्षण के अंतिम दौर में हैं और दुनिया उम्मीद कर रही है कि चालू या अगले महीने से व्यापक टीकाकरण अभियान शुरू हो जाएगा। ऐसेमें यह जानना जरूरी हो गया है कि वैक्सीन के प्रभाव व सुरक्षा के मानक क्या हैं और परीक्षण के दौरान किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है।

परीक्षण की भूमिका

प्रयोगशाला में परीक्षण के दौरान अगर वैक्सीन सुरक्षा मानकों पर सफल रहती है तो वैज्ञानिक उसके प्रभावों की जांच करते हैं। इसकी शुरुआत कम लोगों से की जाती है। सफलता मिलने के बाद लोगों की संख्या बढ़ाई जाती है। इसमें शामिल आधे लोगों को असली वैक्सीन दी जाती है, जबकि आधे पर डमी का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी जानकारी शोधकर्ताओं और स्यवंसेवकों को भी नहीं होती कि किसे असली वैक्सीन दी गई है और किसे डमी। परीक्षण परिणामों का अध्ययन किया जाता है। भले ही कोरोना वैक्सीन का परीक्षण तेजी से किया जा रहा है, लेकिन इस दौरान किसी भी मानक का उल्लंघन नहीं किया जाता।

वैक्सीन में क्या है

दुनिया में 180 से ज्यादा कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहा है। कुछ में वायरस के क्षीण स्वरूप का इस्तेमाल किया गया है। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका में ऐसे वायरस का इस्तेमाल किया गया है जो मनुष्य को नुकसान नहीं करता। फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन में जेनेटिक कोड का इस्तेमाल हुआ है। इसी प्रकार कुछ वैक्सीन मैसेंजर आरएनए यानी एमआरएनए पर आधारित हैं।

सुरक्षा की कैसे होती है जानकारी

किसी भी वैक्सीन या इलाज की डिजाइनिंग व जांच शुरू करने से पहले विज्ञानी इसी सवाल का सामना करते हैं। वैक्सीन की सुरक्षा की जांच सबसे पहले प्रयोगशाला में की जाती है। उसके प्रभावों की भी प्रारंभिक जांच कोशिकाओं और पशुओं पर की जाती है। सुरक्षा परिणाम अनुकूल होने पर वैक्सीन के मानव परीक्षण का दौर शुरू होता है।

बीमारी की आशंका कितनी

छोटे पैमाने पर परीक्षण के दौरान अब तक कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया है, जिसमें वैक्सीन लगवाने वाला स्वयंसेवक बीमार पड़ा हो। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन से कोई बीमारी नहीं होेती, बल्कि यह रोग प्रतिरोधी क्षमता को कोरोना वायरस से लड़ने के लायक बनाती है। हां, कुछ लोगों को मांसपेशियों में तनाव या हल्के बुखार की शिकायत हो सकती है, लेकिन यह सामान्य बात है। वैक्सीन से एलर्जी जैसी शिकायत शायद ही कभी सामने आई हो। डरने की जरूरत इसलिए भी नहीं है, क्योंकि हरी झंडी मिलने के बाद जब वैक्सीन बाजार में उतरेगी तब कवर पर उसमें शामिल तत्वों का भी उल्लेख रहेगा।

ऐसे होता है वैक्सीन का विकास

सभी चरणों में सुरक्षा संबंधी इंतजाम का शोधकर्ता रखते हैं पूरा ध्यान

  • प्रारंभ प्री-क्लीनिकल ट्रायल : कोशिकाओं व चूहाआदि पर परीक्षण
  • पहला चरण : सीमित संख्या में लोगों पर परीक्षण
  • दूसरा चरण : वैक्सीन का परीक्षण सैकड़ों लोगों पर
  • तीसरा चरण : हजारों लोगों को परीक्षण में किया जाता है शामिल
  • चौथा चरण : नियामकों की तरफ से जांच व प्रमाणीकरण
  • पांचवा चरण : नियामकों से हरी झंडी मिलने के बाद वैक्सीन उत्पादनकी शुरुआत
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