ज़रूरत से ज्यादा सेल्फी लेना हो सकता है खतरनाक

नयी दिल्ली । आपके घर में आपके बच्चे और आप अक्सर सेल्फी लेते होंगे। आज के दौर में सेल्फी शब्द किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लेकिन अगर आपके घर में भी किसी को ज़रूरत से ज्यादा सेल्फी लेने का शौक है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि आपके घर में मौजूद ऐसे व्यक्ति को तुरंत इलाज की ज़रूरत पड़ जाए। वैसे डॉक्टरों ने इस रोग को औपचारिक तौर पर कोई नाम नहीं दिया है। लेकिन आम बोल चाल की भाषा में इसे सेल्फीसाइड कहा जा रहा है। इसलिए इस विश्लेषण के दौरान हम इस रोग को सेल्फीसाइड कहकर ही बुलाएंगे ताकि आप इसके बारे में आसानी से समझ पाएं। डॉक्टरों के मुताबिक सेल्फीसाइड के मरीज़ को Emergency Treatment की भी ज़रूरत पड़ सकती है।

देश की राजधानी दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों यानी एम्स और सर गंगाराम अस्पताल में पिछले 3 महीनों के दौरान सेल्फीसाइड के करीब 6 मरीज़ों का इलाज किया गया है। इन मरीज़ों को लगातार सेल्फी लेने की आदत थी और जब ये लत बीमारी में बदल गई तो इन लोगों का इलाज करना पड़ा। एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक जिन मरीज़ों का इलाज उन्होंने किया उन्हें लगातार अपने मोबाइल फोन से सेल्फी लेने की आदत थी और ये लोग सेल्फी लेकर उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया करते थे। ऐसे लोगों में Body Dysmorphic Disorder पाया जाता है, जो बाद में Obsessive Compulsive Disorder में बदल जाता है।

Anxiety And depression Association Of America के मुताबिक BDD यानी Body Dys-morphic Disorder के शिकार लोग अपने शरीर के किसी ना किसी अंग को लेकर नाखुश होते हैं और वो पूरे दिन कई घंटे अपनी इसी कमी के बारे में सोचते रहते हैं। कई बार ये कमी काल्पनिक भी होती है। और सेल्फी पसंद ना आने पर ऐसे लोग अपने शरीर के किसी ना किसी हिस्से, जैसे नाक, होंठ, बाल, त्वचा के रंग और अपनी तोंद को दोष देने लगते हैं।

BDD आगे चलकर OCD यानी Obsessive-Compulsive Disorder में भी बदल सकता है। डॉक्टरों के मुताबिक ये BDD से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति है। Obsessive-Compulsive Disorder एक तरह का मानसिक रोग है। जिसमें मरीज़ को किसी ना किसी चीज़ की लत लग जाती है। उदाहरण के लिए ऐसा मरीज़ तब तक सेल्फी लेता रहता है जब तक उसे अपनी तस्वीर पसंद ना आ जाए, OCD से पीड़ित व्यक्ति दिन में सैंकड़ो सेल्फी भी ले सकता है।

दिल्ली के अस्पतालों में सेल्फीसाइड के जिन मरीज़ों का इलाज किया गया है वो सब Obsessive-Compulsive Disorder से ही पीड़ित थे। ये मरीज़ सोशल मीडिया पर बार बार अपनी सेल्फी अपलोड करते थे और फिर उस पर आने वाले Likes का इंतज़ार करने लगते थे। 8 जुलाई 2016 को हमनें DNA में सेल्फी वाले रोग का एक DNA टेस्ट किया था। तब हमने आपको बताया था कि कैसे सेल्फी लेने का शौक लोगों की जान ले रहा है, क्योंकि लोग खतरनाक जगहों पर भी सेल्फी लेने से नहीं चूकते, हमनें आपको ये भी बताया था कि कैसे दिन भर सेल्फी लेने से लोग सेल्फी एल्बो नामक बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। क्योंकि बार बार सेल्फी लेने वाले व्यक्ति की कोहनी इससे प्रभावित होती है। इसके अलावा हमनें सेल्फी के अन्य दुष्प्रभावों का भी विश्लेषण किया था। और आज ठीक 6 महीने बाद हमें एक बार फिर सेल्फी वाले रोग पर एक DNA टेस्ट करने की ज़रूरत महसूस हुई है।

दुनिया भर की कई हस्तियां, नेता, खिलाड़ी और जाने माने लोग भी सेल्फी लेकर उन्हें अपने प्रशंसकों के साथ शेयर करते हैं। सेल्फी जीवन के अच्छे लम्हों को संभालकर रखने का एक अच्छा विकल्प है लेकिन जिस तरह से सेल्फी लोगों की जान ले रही हैं और उन्हें बीमार बना रही है। उसे देखकर लगता है कि जल्द ही मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों को मोबाइल फोन्स के बॉक्स पर सेल्फी को लेकर वैधानिक चेतावनी छापनी पड़ेगी। ये संभावित चेतावनी कुछ इस तरह की हो सकती है।

जरूरत से ज्यादा सेल्फी लेना आपको बीमार बना सकता है, और आपकी जान ले सकता है। इससे कई तरह के मानसिक रोग होते हैं और ये आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए सेल्फी लेते हुए अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का ध्यान ज़रूर रखें। हमने भविष्य में दी जाने वाली इसी वैधानिक चेतावनी को आधार बनाकर सेल्फी से होने वाले नुकसान पर एक विश्लेषण तैयार किया है जिसे देखने के बाद आप सेल्फी लेना तो बंद नहीं करेंगे लेकिन आपकी सेल्फी पहले से ज्यादा सुरक्षित, सुखद और सुंदर हो जाएगी।

अब सवाल ये है कि अगर आपके घर में भी कोई सेल्फीसाइड का मरीज़ है तो आप उसकी पहचान कैसे करेंगे। इसका सबसे आसान तरीका है उन बच्चों और युवाओं पर निगाह रखना जो दिन भर सेल्फी लेते रहते हैं। यानी अगर आपके परिवार में किसी सदस्य को बार बार सेल्फी लेने की आदत है। तो ये  सेल्फीसाइड के शुरुआती लक्ष्ण हो सकते हैं। यहां हम आपको एक बार फिर बता दें कि सेल्फीसाइड नामक शब्द को डॉक्टरों या मनोवैज्ञानिकों द्वारा मान्यता नहीं मिली है। मनोवैज्ञानिक सेल्फी की लत से परेशान मरीज़ों का इलाज उन्हें OCD यानी Obssesive Cumplusive Disorder से पीड़ित मानकर ही करते हैं।

अगर आपके परिवार का कोई सदस्य सेल्फी लेने के लिए बार बार और लगातार अलग अलग पोज बनाता है, और फिर भी संतुष्ट नहीं होता तो ये भी सेल्फीसाइड का लक्षण हो सकता है। अगर आपके घर का कोई युवा या आपके परिवार का कोई सदस्य सेल्फी लेने के बाद अपने शरीर के किसी विशेष अंग या बनावट को लेकर शिकायत करता है, तो भी आपको सावधानी से उसे समझाने की ज़रूरत है।

सेल्फी लेने के लिए खतरनाक जगहों पर चढ़ जाना, या फिर अपनी जान जोखिम में डालकर सेल्फी लेना भी सेल्फीसाइड का लक्षण हो सकता है। वैसे बार बार सेल्फी लेना या स्मार्ट फोन में खोए रहना युवाओं की ही बुरी आदत नहीं है। बड़ी उम्र के लोग भी इसके आदी हो चुके हैं और कई बार ये आदत उनके अपनों के लिए जानलेवा साबित होती है।

मोबाइल फोन्स में खोए रहने की आदत कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। ये समझने के लिए आपको चीन से आई एक तस्वीर दिखाना चाहता हूं। ये तस्वीरें चीन के शियानयंग के एक रिसॉर्ट की हैं। जहां शियाओ नाम की महिला अपने 4 साल के बेटे के साथ पहुंची थी। ये मां अपने बेटे को लेकर एक स्वीमिंग पूल में उतरती है। और फिर अपने स्मार्ट फोन में व्यस्त हो जाती है। इस दौरान इस महिला का बच्चा गहरे पानी में चला जाता है। लेकिन इस महिला को इस बात का पता ही नहीं लगता क्योंकि इस महिला का सारा ध्यान अपने मोबाइल फोन पर था। इसके बाद इस महिला का बच्चा डूब गया और उसकी मौत हो गई। थोड़ी देर बाद जब इस महिला को अपने बच्चे की याद आई तो उसने बच्चे की तलाश शुरू की। लेकिन तब तक बच्चे की मौत हो चुकी थी। हैरानी की बात ये है कि जिस जगह पर ये बच्चा डूब रहा था वहां और भी लोग मौजूद थे लेकिन किसी का भी ध्यान इस बच्चे पर नहीं गया। इन तस्वीरों से हमें ये सबक मिलता है कि जब भी हम किसी अपने के साथ हों, तो हमें अपने मोबाइल फोन्स और दूसरे गजेट्स से दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि हो सकता है कि एक छोटी सी गलती हमारे अपनों को हमसें दूर कर दें। डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक दिन भर में 6 सेल्फी लेकर उसे सोशल मीडिया पर शेयर करना एक तरह की मानसिक बीमारी का संकेत है।

वैसे Selfies को narci-ssism  की समस्या से भी जोड़ कर देखा जाता है। Narci-ssism एक ऐसा मनोविकार है जिसमें व्यक्ति खुद को दूसरों से बेहतर समझता है और एक तरह के अहंकार से भरा रहता है, इसके पीछे एक बहुत पुरानी कहानी भी है। ग्रीक कथाओं के मुताबिक Narci-ssus नाम का एक सुंदर युवक प्यार की तलाश में भटक रहा था, तभी उसे Echo नाम की एक अप्सरा मिली..लेकिन Narci-ssus ने उस अप्सरा को ठुकरा दिया। इसके बाद Narci-ssus ने एक नदी में अपना चेहरा देखा और खुद से ही प्यार करने लगा। वो नदी में अपना चेहरा निहारने में इतना व्यस्त था कि उसे हालात का पता ही नहीं चला और लापरवाही की वजह से वो नदी में डूबकर मर गया। बाद में मनोवैज्ञानिकों ने खुद को दूसरों से श्रेष्ठ और सुंदर मानने की प्रवत्ति को narci-ssism कहना शुरू कर दिया।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा सेल्फी लेना भी narci-ssism यानी आत्मपूजा की निशानी है। तानाशाह हिटलर को भी narci-ssist कहा जाता था क्योंकि वो खुद को दूसरों के मुकाबले बेहतर और श्रेष्ठ मानता था और उसकी ये सोच एक बीमारी की हद तक गहरी हो चुकी थी। यानी एक तरह से वो अपनी बेहतर छवि से Obsessed था। अहंकार की ये बीमारी भले ही कई हज़ार वर्ष पुरानी हो लेकिन सेल्फी वाला रोग काफी नया है और दुनिया भर के वैज्ञानिक, डॉक्टर और मनोचिकित्सक अभी इसके दुष्प्रभावों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

आपको बता दें कि दुनिया की पहली सेल्फी आज से 177 वर्ष पहले यानी 1839 में अमेरिका के रॉबर्ट कॉर्नेलियस नाम के व्यक्ति ने ली थी। इसके बाद वर्ष 1900 में कैमरा बनाने वाली मशहूर कंपनी Kodak ने Box Brownie नाम का एक ऐसा कैमरा बनाया जिसका इस्तेमाल आम लोग कर सकते थे। Box Brownie नामक कैमरे की मदद से लोग शीशे में दिख रही अपनी तस्वीर को Click कर सकते थे। यानी खुद की तस्वीर खींचने का शौक काफी पुराना है। आपको जानकर हैरानी होगी जो सेल्फी अब मानसिक और शारीरिक समस्या बन चुकी है उसकी उत्पत्ति 2003 में ऑस्ट्रेलिया में हुई थी।

Oxford Dictionary के मुताबिक वर्ष 2003 में ऑस्ट्रेलिया के Nathan Hope नाम के व्यक्ति को गिरने की वजह से चोट लग गई थी और उसने अपने चोटिल चेहरे की तस्वीर खींच कर ब्लॉग पर पोस्ट कर दी और उसे सेल्फी का नाम दिया। आपको बता दें कि ऑस्ट्रेलिया में कई शब्दों के आगे IE लगाने का चलन है, जैसे ऑस्ट्रेलिया में कई बार Fire शब्द के आगे IE लगाकर उसे Fireie कह दिया जाता है। इसी तरह Self के आगे IE लगाने के बाद Selfie शब्द का जन्म हुआ।

Oxford Dictionary ने Selfie को वर्ष 2013 में Word of The Year का दर्जा दिया था। Oxford Dictionary ने Selfie शब्द को परिभाषित करते हुए कहा था कि सेल्फी किसी व्यक्ति की एक ऐसी तस्वीर है जिसे उसने खुद किसी स्मार्टफोन या वेबकैम से लिया हो और जिसे सोशल मीडिया के ज़रिए शेयर किया जाए।

  • एक आंकड़े के मुताबिक पूरी दुनिया में हर रोज़ 10 लाख से ज्यादा Selfies ली जाती हैं।
  • Pew Research Center के मुताबिक दुनिया भर के 91 प्रतिशत युवाओं ने कभी ना कभी Selfies जरूर ली हैं।
  • एक मोबाइल फोन निर्माता कंपनी के रिसर्च के मुताबिक Selfie लेने वाले 14 प्रतिशत लोग उसे Digital Filters और effects के ज़रिए सुंदर बनाने की कोशिश करते हैं।
  • जबकि 34 प्रतिशत लोग अपनी Selfie को Post करने से पहले Edit जरूर करते हैं।
  • Post करने से पहले Selfie को आकर्षक बनाने के मामले में पुरुष महिलाओं से आगे हैं। Survey में 34 प्रतिशत पुरुषों ने माना कि वो Selfie Post करने से पहले उसे Editing के ज़रिए आकर्षक बनाते हैं।
  • जबकि 13 प्रतिशत महिलाएं भी अपनी सभी Selfies के साथ ऐसा ही करती हैं।

जुलाई 2016 एक रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी लेते हुए दुनिया भर में होने वाली मौतों में से 50 फीसदी मौतें भारत में होती हैं। यानी भारत लापरवाही से सेल्फी लेने वाले लोगों की राजधानी है। पूरी दुनिया में सेल्फी खींचने के दौरान होने वाली मौतों के मामले में भारत पहले नंबर पर है जबकि दूसरे नंबर पर रूस है।

यहां हम Selfie से जुड़ा एक Extra विचार भी आपके सामने रखना चाहते हैं। आपने गौर किया होगा कि ज्यादातर लोग सेल्फी लेने के बाद उसे सीधे ही सोशल मीडिया पर शेयर नहीं करते हैं। बल्कि उस तस्वीर को सुधारने के बाद उसे दूसरों के सामने रखते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सेल्फी तस्वीर लेने का प्राकृतिक तरीका नहीं है। सेल्फी लेने के दौरान अक्सर लोग अपने चेहरे की बनावट बदलने की कोशिश करते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक लोग सेल्फी लेते हुए अपने चेहरे के बाएं भाग को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। ये Trend 14वीं सदी से लेकर अब तक बनाई गई 60 प्रतिशत पेटिंग्स में दिखाई देता है। ईसा मसीह की 90 प्रतिशत पेटिंग्स में उनके शरीर के बाएं हिस्से को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इंसान के शरीर का बायां हिस्सा ज्यादा Expressive है। शरीर के बायें हिस्से को दिमाग का वो हिस्सा नियंत्रित करता है जो भावनाओं पर काबू रखता है। यानी ज्यादातर सेल्फी भावनाओं में बहकर ली जाती हैं। आप कह सकते हैं कि ये तस्वीरें बहुत हद तक वास्तविक नहीं होती है और जो चीज़ सच्चाई से दूर हों उसके लिए इतनी दीवानगी अच्छी बात नहीं है।

 

साभार: जी न्‍यूज

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